Wednesday, April 25, 2012
हम साथ साथ हैं
गन्दा है पर धंदा है
Tuesday, April 24, 2012
संक्रमण काल
Sunday, April 22, 2012
संघर्ष से कार्टून तक:-
बंगाल का नया संकट संसदीय राजनीति का वह चेहरा है, जिसे बहुसंख्य तबके ने
इस उम्मीद से जीया कि लोकतंत्र आयेगा। लेकिन सत्ता ने उसी जमीन पर अपना
सियासी हल चलना शुरु कर दिया जिसने लोकतंत्र की दुहाई देकर सत्ता पाई। अगर
बंगाल के सियासी तौर तरीको में बीते चार दशकों को तौलें तो याद आ सकता है
कि एक वक्त सिद्रार्थ शंकर रे सत्ता के हनक में नक्सलबाडी को जन्म दे बैठे।
फिर नक्सलबाडी से निकले वामपंथी मिजाज ने सिंगूर से लेकर नंदीग्राम तक जो
लकीर खिंची उसने ममता के मां,माटी मानुष की थ्योरी को सत्ता के ड्योढी तक
पहुंचा दिया। लेकिन इन सियासी प्रयोग में वामपंथ की एक महीन लकीर हमेशा
मार्क्स-एंगेल्स को याद करती रही। शायद इसीलिये तीन दशक की वामपंथी सत्ता
को उखाडने के लि ममता की पहल से कई कदम आगे वामपंथी बंगाल ही चल रहा था
जिसे यह मंजूर नहीं था कि कार्ल मार्क्स और फ्रेड्रिक एंगेल्स को पढ कर
वामपंथी सत्ता ही वामपंथ भूल जाये। लेकिन सत्ता पलटने के बाद वाम बंगाली
हतप्रभ है कि अब तो कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ही सत्ता को बर्दास्त नहीं
है। वाम विचार से प्रभावित अखबार भी सत्ता को मंजूर नहीं हैं। जिस अतिवाम
के हिंसक प्रयोग को वामपंथी सत्ता की क ट के लिये मां, माटी, मानुष का नारा
लगाकर ममता ने इस्तेमाल किया गया उसी अतिवाम के किशनजी का इनकांउटर कराकर
ममता ने संकेत दे दिये कि जब संसदीय सियासत ही लोकतंत्र का मंदिर है तो
इसके नाम पर किसी की भी बलि दी ही जा सकती है। इस कड़ी में अस्पतालों में
दुधमुंहे बच्चों की मौत के लिये भी पल्ला झाड़ना हो या फिर बलात्कार के
मामले में भुक्तभोगी को ही कटघरे में खड़ा करने का सत्ता का स्वाद और इन
सबके बीच खुद पर बनते कार्टून को भी बर्दाश्त ना कर पाने की हनक।
यह परिस्थियां सवाल सिर्फ ममता को लेकर नहीं करती बल्कि संसदीय चुनाव की
जीत में ही समूची स्वतंत्रता,लोकतंत्र और जनता की नुमाइन्दगी के अनूठे सच
पर भी सवाल खड़ा करती है। यह सवाल ऐसे हैं, जो किसी भी राज्य के लिये सबसे
जरुरी है। क्योंकि इसी के जमीन पर खड़े होकर किसी भी राज्य को विकास की
धारा से जोड़ा जा सकता है। या कहें आम आदमी को अपने स्वतंत्र होने का एहसास
होता है। लेकिन जब सत्ता का मतलब ही संविधान हो जाये तो फिर क्या क्या हो
सकता है यह बंगाल की माली हालत को देखकर समझा जा सकता है। जहा संसदीय
राजनीति के जरीये सत्ता बनाये रखने या सत्ता पलटने को ही लोकतंत्र मान लिया
गया। और हर आम बंगाली का राजनीतिकरण सत्ता ने कर दिया। उसकी एवज में बीते
तीन दशक में बंगाल पहुंचा कहां यह आज खड़े होकर देखा जा सकता है। क्योंकि
कभी साढ़े बारह लाख लोगों को रोजगार देने वाला जूट उघोग ठप हो चुका है। जो
दूसरे उद्योग लगे भी उनमें ज्यादातर बंद हो गए हैं। इसी वजह से 40 हजार
एकड़ जमीन इन ठप पड़े उघोगों की चारदीवारी में अभी भी है। यह जमीन दोबारा
उघोगों को देने के बदले सत्ता से सटे दलालों के जरीये व्यवसायिक बाजार औऱ
रिहायशी इलाको में तब्दील हो रही है। चूंकि बीते दो दशकों में बंगाल के शहर
भी फैले हैं तो भू-माफिया और बिल्डरों की नजर इस जमीन पर है। और औसतन वाम
सत्ता के दौर में अगर हर सौ कार्यकर्त्ता में से 23 कार्यकर्ता की कमाई
जमीन थी। तो ममता के दौर में सिर्फ आठ महीनो में हर सौ कार्यकर्ता में से
32 की कमाई जमीन हो चुकी है।
बंगाल का सबसे बड़ा संकट यही है कि
उसके पास आज की तारीख में कोइ उघोग नही है, जहां उत्पादन हो। हिन्दुस्तान
मोटर क उत्पादन एक वक्त पूरी तरह ठप हो गया था। हाल में उसे शुरु किया गया
लेकिन वहां मैनुफेक्चरिग का काम खानापूर्ति जैसा ही है। डाबर की सबसे बड़ी
इंडस्ट्री हुबली में थी। वहां ताला लग चुका है। एक वक्त था हैवी
इलैक्ट्रिकल की इंडस्ट्री बंगाल में थी। फिलिप्स का कारखाना बंगाल में था।
वह भी बंद हो गए। कोलकत्ता शहर में ऊषा का कारखाना था। जहां लॉकआउट हुआ और
अब उस जमीन पर देश का सबसे बडा मॉल खुल चुका है। जो मध्यम तबके के आकर्षण
का नया केन्द्र बन चुका है। लेकिन नयी परिस्थितयों में मॉल आकर्षण का
केन्द्र है तो मैनुफेक्चरिंग युनिट रोजगार की जरुरत है। लेकिन बंगाल की
राजनीति ने नैनो के जरीये किसान की राजनीति को उभार कर यह संकेत तो दिये कि
हाशिये पर उत्पादन को नहीं ले जाया जा सकता है लेकिन जो रास्ता पकड़ा
उसमें उदारवादी अर्थव्यवस्था के उन औजारों को ही अपनाया जो उत्पादन नहीं
सर्विस दें। क्योंकि सर्विस सेक्टर का मतलब है नगद फसल। इसीलिये राज्य में
आईटी सेक्टर सरीखे यूनिट जोर पकड़े हुये हैं और शिक्षण सस्थानों का मतलब या
उनसे पढ़कर निकलने वाले छात्रों के ज्ञान का मतलब कम्प्यूटर ट्रेनिंग ही
ज्यादा हो चला है। इसीलिये कोलकत्ता के कॉलेज स्ट्रीट का मतलब अब किताब,
चर्चा या सामाजिक-आर्थिक बदलाव के लिये राजनीति चिंतन नहीं बल्कि बीपीओ का
जमघट है। जहा नशा भी है और चकाचौंध भरी थिरकन भी। इसलिये बंगाल में
मां,माटी और मानुष नयी परिभाषा भी गढ़ रही है और किसाम-मजदूर का सवाल उठाकर
विकास की बाजारु लकीर खींच कर उन्हें खत्म भी किया जा रहा है।
नयी
जमीन जिन उघोगों को दी जा रही है, उसके लिये वह इन्फ्रास्ट्रक्चर भी खड़ा
किया जा रहा है,जो वाम समझ की परिभाषा तले उत्पादन करते लोगों को कभी नही
किया गया है। खेती का कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर समूचे बंगाल में आज बी नहीं है।
मछुआरों के लिये कभी कोई योजना बनायी नहीं गई।
बुनकरो के हुनर
को श्रमिक मजदूर में बदल कर रोजगार देने का तमगा जरुर इस नये दौर में लगाया
जा रहा है। अहर बंगाल को सडक से ही नाप लें तो ग्रामीण इलाकों में बिजली
के खम्बे और पानी की सप्लायी लाइन तक गायब मिलेगी। बंगाल में 90 फीसद खेती
योग्य जमीन इतनी उपजाऊ है कि उसे राज्य से कोई मदद की दरकार नहीं है। यानी
निर्धारित एक से तीन फसल को जो जमीन दे सकती है, उसमें कोई अतिरिक्त
इन्फ्रास्ट्रक्चर नही चाहिये। खेत की उपज बड़े बाजार तक कैसे पहुंचे या
दुसरे राज्यों में अन्न कैसे व्यवस्थित तरीके से व्यापार का हिस्सा बनाया
जाये,जिससे किसानों को उचित मूल्य मिल सके इसका भी कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर
नहीं है। जाहिर है किसान उपजाता है और बिचौलिए अपने बूते बांग्लादेश में
व्यापार के नाम पर अन्न की स्मगलिंग करते है,जो सबसे ज्यादा मुनाफे वाला
व्यापार हो चला है। चूंकि मुनाफा शब्द बंगाल के काले जादू सरीखा हो चला है
तो समूची राजनीति ही इस काले जादू को अपना कर पूर्व के छह राज्यों की
जिन्दगी बंगाल से जोड़ रही है। ममता अपनी राजनीति को पंख देना चाहती है और
सत्ता इस पंख में मुनाफे की सांस अटका रही है। पूर्वी राज्यों में जाने
वाला हर सामान बंगाल के सत्ताधारियों की अंटी में फंसे नोटो के लाइसेंस में
फंसा है। आम बंगाली इसे देख भी रहा है और आक्रोश भी उपजा रहा है। फिर नयी
परिस्थितयों में यह सवाल अपने आप में एक बड़ा सवाल खड़ा हो चला है कि किसान
चेतना क्या साठ के दशक की तर्ज पर बंगाल में दोबारा खड़ी हो सकती है।
हालांकि तब और अब की परिस्थितयां बिलकुल उलट हैं । कांग्रेस की जगह कल
वामपंथी थे तो आज कांग्रेस के साथ खड़ी तृणमूल है। जिसने सत्ता में आने के
लिये नक्सलवादियों की लकीर को पकड़ा जरुर लेकिन सत्ता पाने के बाद उन
नीतियों से परहेज नहीं किया, जिसमें यह अवधारणा बने कि खेती अब लाभदायक
नहीं रही। लेकिन किसान और मजदूर को राजनीतिक सत्ता के पैकेज पर टिकाये रखकर
बंगाल की वाम मानसिकता से खुद को जोड़े रखने का फ्राड भी सियासी सौदेबाजी
की जरुरत बन गई। यानी बंगाल जिस संघर्ष को बीते चार दशको से आक्सीजन मानता
रहा ममता के राज में वही संघर्ष सत्ता का पर्यायवाची बना दिया गया। नया
सवाल भी यही है कि 1964 से 1977 तक बंगाल की राजनीति ने किसानों के आसरे
जिस आंदोलन के माहौल को जन्म दिया और 1977 से लेकर 1991 तक बंगाल की सत्ता
ने जिस तरह भूमि सुधार से लेकर आम बंगाली के लिये भी सामाजिक मान्यता
सामाजिक तौर पर और सत्ता के भीतर भी बनायी रखी । वह 1997 से 2010 तक जिस
तेजी से खत्म हुई उसे बदलने के लिये पहली बार 2011 में वाम बंगाल ने जिस
सियासत को हवा दी वह सत्ता बरस भर के भीतर ही कागजी कार्टून में बदल गई।
लेकिन कार्टून के आसरे सिर्फ ममता को परखना सही नहीं नही होगा ।
जरुरी है बंगाल की उस नब्ज को पकडना जो बीते चार दशको से अपने प्रयोगों के
जरीये ही खुद खून भी बहाती है और सत्ता के प्यादो को यह एहसास भी कराती है
कि उनकी भोथरे राजनीतिक प्रयोग में भी धार है। शायद इसीलिये सीपीएम ने अगर
चार दशक पहले भूमि सुधार की पहल की तो वह किसान चेतना का दबाव था। उस वक्त
नक्सली नेता चारु मजूमदार नेनक्सलबाडी का जो खाका तैयार किया और जो संघर्ष
सामने आया उसने सत्ता पर कब्जा करनेवाली शक्ति के तौर पर किसान चेतना को
परखा। चूंकि उस दौर में किसान संघर्ष जमीन और फसल के लिये नहीं था,बल्कि
राजसत्ता के लिये था। सीपीआई के टूटने के बाद इस नब्ज को सीपीएम ने इसलिये
पकड़ा क्योंकि आम बंगाली ऐसा सोच रहा था और संसदीय राजनीति को किसान सरोकार
में ढाल कर सत्ता तक पहुंचा जा सकता है, इसे सीपीएम ने माना था। और तब से
लेकर अभी भी गाहे-बगाहे वामपंथी यह कहने से नही चूकते कि संसदीय राजनीति तो
उसके लिये क्रांति का वातावरण बनाने के लिये महज औजार है। लेकिन नयी
परिस्थितयों में ममता की राजनीति इस औजार के लिये जिस तरह अपने आधार को ही
खारिज कर सत्ता के नारे को लगाने से नहीं चूक रही है, उसमें क्या यह माना
जा सकता है कि किसान के संघर्ष का पैमाना भी मध्यम तबके की जरुरतों और
राजनीतिक सौदेबाजी के ही दायरे में सिमट चुका है। और जो राजनीति 40 साल
पहले किसान चेतना से शुरु हुई थी, वह 180 डिग्री में घूम कर सत्ता के बाजार
चेतना में बदल चुकी है। और बाजार कभी भी नागरिकों को नहीं देखता उसे
उपभोक्ताओं की जरुरत होती है। और ममता यह समझ चुकी हैं कि संसदीय राजनीति
से बड़ा बाजार इस देश में कुछ है नहीं तो वह नागरिको के कार्टून को
बर्दाश्त कर नहीं सकती और सत्ता के लिये खुद को बिना कार्टून बनाये रह नहीं
सकती।
लेखक - पुण्य प्रसून बाजपई
Tuesday, December 2, 2008
अब डरने लगा हूँ
पहले डरता नही था पर अब डरने लगा हूँ ,
रोज़ तिल तिल कर मरने लगा हूँ ,
रोज़ बस से आफिस जाता हूँ ,
इसलिए आस पास की चीज़ों पर ध्यान लगता हूँ
सीट के नीचे किसी बम की शंका से मन ग्रसित रहता है
कभी कोई लावारिस बैग भ्रमित करता है ।
ख़ुद से ज़्यादा परिवार की फ़िक्र करता हूँ
इसलिए हर बात मे उनका ज़िक्र करता हूँ
रोज़ अपने चैनल के लिए ख़बर करता हूँ
और किसी रोज़ ख़बर बनने से डरता हूँ
मैं एक आम हिन्दुस्तानी की तरहां रहता हूँ
इसलिए रोज़ तिल तिल कर मरता हूँ
हालात यही रहे तो किसी रोज़ मैं भी
किसी सर फिरे की गोली या बम का शिकार बन जाऊँगा
कुछ और न सही पर बूढे अम्मी अब्बू के
आंसुओं का सामान बन जाऊँगा।
इस तरह एक नही कई जिनदगियाँ तबाह हो जाएँगी
बहोत न सही पर थोडी ही
दहशतगर्दों की आरजुओं की गवाह हो जाएँगी ।
इसीलिए मैं अब डरने लगा हूँ
हर रोज़ तिल तिल कर मरने लगा हूँ ,तिल तिल कर मरने लगा हूँ ।
Wednesday, August 27, 2008
अहमद फ़राज़-'बुझ गया चिराग'

(kaThin : difficult; raahguzar : path)
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है मैं जानता हूँ मगर थोडी दूर साथ चलो
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नही बड़ा मज़ा हो अगर थोडी दूर साथ चलो
ये एक शब् की मुलाक़ात भी ग़नीमत हैकिस है कल की ख़बर , थोरी duur saath chalo
अभी तो जाग रहे हैं चिराघ राहों के अभी है दूर सहर थोडी दूर साथ चलो
(sahar : dawn)
तवाफे मंजिले जानां हमें भी करना है “फ़राज़ ” तुम भी agar थोडी दूर साथ चलो
tavaaf-e-manzil-e-jaanaaN : circumabulation of the house of beloved)
Ahmed Faraz
Saturday, May 31, 2008
सेक्स वायरस
'नेशनल इंस्तितुएत आफ हेल्थ एंड फैमिली वेल्फैयेर ' और राष्ट्रीय स्वस्थ मंत्रालय की रिपोर्ट को माने टू भारतीय yuva ब्रिगेड का १/३ अपनी यौन इक्छाओं की पूर्ति शादी से पूर्व ही कर लेता है ,सर्वेचन इस बात की ओर इशारा करते है की विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध और गर्भ निरोधक का इस्तेमाल सबसे अधिक स्कूल और कॉलेज के छात्र \छात्राओं मे युवा ,कामकाजी पुरूष ,महिलाऐं और १५ से २४ साल के उन लोगों मे बढ़ा है जो झोपड़ पट्टी में रहते है और इनमें दिल्ली और लखनु अन्य शहरों से आगे हैं ।
इन अध्यनों से जो तस्वीर उभर कर सामने आती है वह विभिन वर्गों मे भिन्न - भिन्न यौन सम्बन्धों की कहानी कहती है , कट्टर उत्तर भारतीय लोगों मे विवाह पूर्व सम्बन्ध 'जवान कामकाजी लोगों मे ३५ % ,स्कूल के छात्र /छात्राओं मे १७% है , बड़े शहरों मे लखनु ,दिल्ली से भी आगे है ।
३३०० लोगों पर किए गए सर्वेचन मे अधिकता उन लोगों की रही जिन्होंने यौन सुख १६ से १८ साल की उम्र मे प्राप्त कर लिया था । इस अध्यन से शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकला कि प्रथम बार यौन सम्बन्ध बनाने मे लड़कों कि औसत आयु १७.४ साल रही जबकि लड़कियों कि १८.२ साल । लक्चित समूह कि ६०% लोगों ने कहा कि वह सेक्स बहुत कम या कभी -कभी करते हैं इसी समूह के १/३ लोग ऐसे पाये गए जिन्हें असुरचित यौन सम्बन्धों के विषय मे जानकारी नही थी । ३% से ४% लोगों ने कई लोगों से अलग -अलग सम्बन्ध बनाए थे ।
इन अध्यन से कुछ रोचक तथ्य भी सामने आए ,लकचित वर्ग के ३०% लोगों [५४% पुरूष ,२०% महिलाऐं ] ने कहा 'हालांकि उन्होंने कभी विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध नही बनाए परन्तु उनके दोस्तों ने बनाए हैं । १८% पुरुषों ने स्वीकार किया कि उन्होंने किसी अनजान से या फिर देह व्यापार करने वाली महिलाओं से सम्बन्ध स्थापित किए केवल ०.२% युवा ऐसे रहे जिन्हें सेक्स करने के बाद गलती का एहसास हुआ ,५% युवाओं ने समलैंगिकता कि बात स्वीकार की ।
लकचित वर्ग के बहुत बड़े समूह ने स्वीकार कि 'लड़के और लड़कियों के एक दूसरे के करीब आने और मेल-जोल ने सेक्स सम्बन्धी विषय की जानकारी को रोचक और व्यापक बना दिया है और आपसी समझ को भी विकसित किया है । दिल्ली जैसे शहर मे महिलाओं के अपेचा पुरूष इस बार मे विश्वास करता है की चूमना ,एक दूसरे को समय देना ,डेट पर जाना युवा लोगों मे आम बार है ।
Friday, May 23, 2008
डर
ट्रेन 8:३० कि थी बरेली जंक्शन से ही बन कर चलने कि वजह से लेट होने कि सम्भावना कम ही थी फिर हमारा घर भी स्टेशन से 8-10 कम दूर था इसलिए हमे 7 बजे तक घर से निकल जाना था .दोस्तो के साथ सारा प्रोग्राम फिक्स करने के बाद मैंने अपना बैग पैक करना शुरू किया ,इधर अम्मी भी एक -एक चीज़ याद दिला कर रख्वाती जा रही थी ,घर का घी और आचार अलग से ख़ास ताकीद करके रख दिया गया था कि खाने मे कोताही मत करना सेहत का ख्याल रखना .
घड़ी ने 7 बजे का इशारा किया और अब्बू ने अम्मी को टोकना शुरू किया कि मुझे जल्दी निकल कर स्टेशन पहुच जाना चाहिए ,कहीं मेरी लेट लातिफी मे ट्रेन न छूट जाए .
घर से निकल कर कुछ दूर चलने पर ही ऑटो रिक्शा मिल जाता है लेकिन ये क्या आज एक भी रिक्शा नज़र नही आ रहा था ,कुछ देर इंतज़ार करने के बाद मेरी धड़कने बढ़ने लगी और मे बेचैन होने लगा .घबराहट और बढ़ गई जब मैंने घड़ी पर निगाह की,सूइयाँ 7:45 का इशारा कर रही थी ,इसी वक्त दूर से कोई आता दिखाई दिया ,करीब आया टू मैंने झट से आगे बढ़ कर उसकी साइकिल का हेंडल थाम लिया ,वो बेचारा लड़खारा गया लेकिन मैंने सँभालते हुए एक ही साँस मे आपनी सारी व्यथा सुना डाली , किस्मत अच्छी थी वो भी स्टेशन के करीब मंदी तक जा रहा था . बिना इजाज़त लिए men उचक कर कारिएर पर सवार हो गया और उम्मीद भारी निगाहें उसके चेहरे पर गदा दी ,जैसे वो ही अब मेरा आखरी सहारा हो .साइकिल आगे बड़ी और साथ मे मेरी उम्मीद भी ,इतनी देर मे न जाने कितने बुरे ख्याल दिल मे आ चुके थे .
अल्लाह -अल्लाह करते हुए हम स्टेशन चौराहे पर पहुंचे ,मैंने घड़ी पर नज़र दौदै टू कलेजा मुह को आ गया । 8 बज्के 25 मिनट हो चुके थे और अभी स्टेशन आधे किलोमीटर दूर था मैंने आओ देखा न ताओ और लगी दी दौड़ स्टेशन की ओर और मांग डाली साडी मन्नतें ट्रेन पकड़ने के लिए .ठीक साधे आठ बजे मई स्टेशन पहुँच गया ,इधर अनीस और अतहर मेरे ऊपर अपना दांत पीस रहे थे ,वो टू अच्छा हुआ की अतहर ने टिकेट पहले से ही ले रखा था । इधर ट्रेन प्लात्फोर्म पर रेंग चुकी थी हम लोग दौड़ते हुए प्लात्फोर्म पर पहुंचे और कूद कर सामने वाले डिब्बे मे चढ़ गए ,बाहर चल रही हवाओं की सनसनाहट के अलावा और कोई आवाज़ उस डिब्बे मे नही थी ,कुछ देर बाद एहसास हुआ की हम लोग लगेज कोम्पर्त्मेंट मे चढ़ गए थे .
ट्रेन चल चुकी थी और रात के अंधेर मे किसी अगले स्टेशन पर उतर कर डिब्बा बदलने की हिम्मत हम मे से कोई नही कर पा रहा था मे आगे बढ़ कर जगह तलाशने लगा to मेरी टांग से कोई चीज़ टकराई और मुझे एहसास हुआ की नीचे कुछ पड़ा है , झुक कर देखा टू कुछ लोग बड़ी बेखबरी के साथ सो रहे थे ,पास की जगह खली थी हमने भी उनको बिना कोई तकलीफ दिए अपनी चादर बिछा दी और लेट गए ,पूरी तरह खुले दरवाज़े के दोनों तरफ़ बहती हवाएँ जैसे हमें अपनी बाँहों मे जकड़ने के लिए बेताब हओ रही थी और हम छोटे बचों की तरह पकड़ से आजाद होने के लिए अपनी ही बाँहों मे सिमटे चले जा रहे थे ,एक दूसरे का आलिंगन हमें गर्मी का हल्का एहसास करा रहा था ,और इस वक्त रिश्तों की गर्मी के एहसास ने ठंड के एहसास को भी कुछ देर के लिए ही सही पर पिघला ज़रूर दिया
हम सिमट कर लेट गए और कुछ ही देर मे हमें नींद ने आ घेरा ,देर रात जब मुझे तेज़ ठंड का एहसास हुआ to मेरी नींद टूट गई ,देखा to अनीस पूरा कम्बल अकेले ही लपेटे सो रहा था .कहिलियत ki वजह से मैंने भी उसे जगाया नही और अपने बघल मे सोये हुए शक्स की ही चादर मे पाऊँ दाल दिए ,वो भी शायद गहरी नींद मे था जो मना नही किया .मैंने लगभग दो घंटे की नींद और ली ,मेरी आँख करीब तीन बजे उस वक्त खुली जब हमारे डिब्बे मे हलचल शुरू हुई ,तोर्चों से पीली रौशनी बिखेरते हुए दो लोग डिब्बे के अन्दर दाखिल हुए और उनके पीछे करीब आठ दस लोग और भी ,एक शूर सुने दिया “उठाओ भाई उठाओ सभी लाशों को नीचे उतारो .”लाश शब्द सुनते ही मेरी नींद फक्ता हओ गई ,अब तक अतहर और अनीस भी जाग चुके थे .मामला समझ मे आता इससे पहले ही एक पुलिस वाले ने हमें बाहर निकलने का इशारा किया ,शदीद तेज़ ठंड मे हम बाहर खड़े थे और हमारे बदन se पसीने ऐसे छूट रहे थे जैसे झेथ की गर्मी के मौसम मे .अब तक हम समझ चुके थे जो लोग हमारे बघल मे सोते हुए से लग रहे थे वो डर असल उन लोगों की लाशें थी जो किसी स्टेशन पर हादसे का शिकार हओ गए थे .